जीवन को बचा लेने, सुंदर बना लेने की चाह रखती भगवत रावत की कविता – ‘करुणा’

प्रगतिशील कवि भगवत रावत का जन्म 13 सितम्बर, 1939; ग्राम—टेहेरका, ज़‍िला—टीकमगढ़ (म.प्र.) में हुआ। भगवत रावत समकालीन हिन्दी कविता के शीर्षस्थ कवि, साहित्यकार और मेहनतकश मज़दूरों के प्रतिनिधि कवि के रूप में प्रसिद्ध रहे।

उन्होने समाज की अमानवीय स्थितियों के विरोध में भी कई कविताएं लिख। वे मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष और ‘वसुधा’ पत्रिका  के संपादक भी रहे। भगवत रावत ने 1967 से 1982 तक क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, मैसूर (कर्नाटक) तथा भोपाल में हिन्दी के व्याख्याता पद पर अपनी सेवाएँ देने के बाद 1983 से 1994 तक हिन्दी  के रीडर पद पर कार्य किया और उसके बाद वे दो वर्ष तक ‘मध्य प्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी’ के संचालक भी रहे। इसके पश्चात, 1998 से 2001 तक वे क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, भोपाल में हिन्दी के प्रोफेसर तथा समाज विज्ञान और मानविकी शिक्षा विभाग के अध्यक्ष रहे और फिर उन्होने 2001 से 2003 तक साहित्य अकादेमी, मध्य प्रदेश के निदेशक तथा मासिक पत्रिका ‘साक्षात्कार’ का सम्पादन कार्य भी किया।

मध्य प्रदेश की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के विकास एवं संचालन में भगवत रावत का सक्रिय योगदान रहा है। बहुत सारे सम्मानों से नवाज़े जा चुके भगवत रावत की कविताओं का अनुवाद उर्दू, पंजाबी, मराठी, बांग्ला, ओडिया, कन्नड़, मलयालम, अंग्रेज़ी तथा जर्मन भाषाओं में किया जा चुका है।

किडनी की गम्भीर बीमारी से जूझते हुए इस प्रतिबद्ध कवि का निधन 25 मई, 2012 को भोपाल (म.प्र.) में हुआ। भगवत रावत की कविताएं उनके विचारों को हम सबके बीच ज़िंदा रखे हुए हैं।

संवेदनाओं से दूर होते समय में, जहां नफ़रतों को सामान्य मान भुला दिया जाता है, आइए पढ़ते हैं, भगवत रावत की एक बेहद महत्वपूर्ण कविता, जिसका शीर्षक है- करुणा। यह कविता राधाकृष्ण प्रकाशन से 1996 में प्रकाशित “सच पूछो तो” संग्रह में उपलब्ध है। जीवन को बचा लेने, सुंदर बना लेने की चाहना रखती भगवत रावत की यह कविता काफी प्रासंगिक व महत्वपूर्ण है। इस कविता में कवि जिस करुणा का ज़िक्र कर रहा है, उसकी ज़रूरत इस समय और समाज को बहुत ज्यादा है।

करुणा

सूरज के ताप में कहीं कोई कमी नहीं

न चन्द्रमा की ठंडक में

लेकिन हवा और पानी में ज़रूर कुछ ऐसा हुआ है

कि दुनिया में

करुणा की कमी पड़ गई है।

इतनी कम पड़ गई है करुणा कि बर्फ़ पिघल नहीं रही

नदियाँ बह नहीं रहीं, झरने झर नहीं रहे

चिड़ियाँ गा नहीं रहीं, गायें रँभा नहीं रहीं।

कहीं पानी का कोई ऐसा पारदर्शी टुकड़ा नहीं

कि आदमी उसमें अपना चेहरा देख सके

और उसमें तैरते बादल के टुकड़े से उसे धो-पोंछ सके।

दरअसल पानी से होकर देखो

तभी दुनिया पानीदार रहती है

उसमें पानी के गुण समा जाते हैं

वरना कोरी आँखों से कौन कितना देख पाता है।

पता नहीं

आने वाले लोगों को दुनिया कैसी चाहिए

कैसी हवा कैसा पानी चाहिए

पर इतना तो तय है

कि इस समय दुनिया को

ढेर सारी करुणा चाहिए।

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