एक बेहतर समाज के लिए मौलिक चिंतन सबसे ज़्यादा ज़रूरी है 

एक बड़ी शख्सियत अपने बड़प्पन से भयाक्रांत नहीं करती बल्कि सामने वाले को एक इत्मीनान और सहजता देती है। एक ऐसी ही मुकम्मल शख्सियत से हमने बीते दिनों पंजाब कला भवन के कार्यालय में बातचीत की। सुरजीत पातर भाषा व साहित्य के दुनिया में एक बुलंद आवाज़ है, एक स्थापित मुकम्मल छवि  हैं। साहित्य के विभिन्न पुरस्कारों समेत पद्मश्री पुरस्कार से इन्हें नवाज़ा जा चुका है। एक लंबे समय तक शिक्षण कार्य, लगातार रचनात्मक लेखन करने के अतिरिक्त पंजाबी साहित्य अकादमी, लुधियाना के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया है। वर्तमान में पंजाब कला भवन के अध्यक्ष पद पर कार्यरत होकर भाषा के प्रति कार्य कर रहे हैं। 

इस महत्वपूर्ण, मुकम्मल शख्सियत से भाषा, साहित्य, समाज, राजनीति जैसे तमाम मुद्दों पर काफी बातें हुई! यह बातचीत हम आप सबके साथ ऑफ़ द सिटिजंस के इस पेज के ज़रिए साझा कर रहे हैं। 

सबसे पहले तो हम और हमारे पाठक आपकी जीवन यात्रा को जानना चाहेंगे।

मेरा जन्म जालंधर के पत्तर कलां में सन 1945 में हुआ। यह गाँव जालंधर, कपूरथला, करतारपुर- इन तीनों शहरों के केंद्र में है। इस गाँव में चौथी जमात तक ही शिक्षा की व्यवस्था थी। उसके बाद मैं साथ के गाँव खैरा मंझा के स्कूल में गया। रणधीर कॉलेज, कपूरथला से मैंने ग्रैजुएशन की। एमए पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला से की। कुछ देर पीएचडी में मैंने लगाया वहाँ। उन दिनों वहाँ लंबा स्ट्राइक चला और मुझे वहाँ से जाना पड़ा। फिर अमृतसर के पास के एक कॉलेज मैं मैं लेक्चररशिप करने लगा। उसके 1 साल बाद में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना में लग गया जहां मैंने 32 साल काम किया । 

उस वक़्त वहाँ एम एस रंधावा वाईस चांसलर थे जिन्हें नए पंजाब का सृजक भी कहा जाता है। पीएयू यूं तो कृषि विश्वविद्यालय था, पर वहां कम्युनिकेशन के तहत भाषा और साहित्य भी पढाई जाती थी। इसके अलावा इस विश्वविद्यालय ने 4 साहित्य अकादमी विजेता दिए। साहित्य के प्रति इस यूनिवर्सिटी का यह भी एक योगदान है। पंजाबी साहित्य में कृषि जीवन का चित्रण विषयक प्रोजेक्ट पर मैंने यहाँ काम किया। बाबा फरीद की कविताओं से शुरू किया गया यह प्रोजेक्ट एक शोध का कार्य था। इसके अलावा मैंने वहाँ शिक्षण का कार्य भी किया। गुरु नानक देव विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। 

जब मैं बहुत छोटा था मेरे पिताजी परदेस गए। तब मैं दूसरी जमात में पढता था। उस छोटी उम्र मैं मैंने अपने पिताजी को जो विदेश जाते देखा, उसकी छवि मेरे मन में लम्बे समय तक रही। मेरा जन्म 4 बहनों के बाद हुआ और एक मेरा छोटा भाई है। मेरे मन में बचपन से ही 2 बातें थी कि मैं या तो संगीतकार बनूँ या फिर कवि बनूँ। कुछ घर के माहौल का भी असर था। जैसे मेरे पिता जी गुरबानी संगीत के जानकार थे। गुरबानी में संगीत और शब्द जुड़े होते है। सारी गुरबानी गाई जाती है। पूरा गुरुग्रंथ साहेब कई रागों में वर्गीकृत है। पहली इच्छा संगीतकार बनने की थी। मेरे घरवालो से मैंने गुज़ारिश की थी कि मुझे हारमोनियम दिला दें पर सब कहते थे कि थोड़ा बड़ा हो जा पहले। फिर मैंने कविता लिखने की कोशिश शुरू कर दी। पढना भी शुरू कर दिया।

साहित्य को लेकर सबकी अपनी परिभाषाएँ हैं, आप साहित्य को कैसे समझते हैं?

साहित्य की बात करूँ तो आई थिंक इन पोएट्री आई फील इन पोएट्री, आई एक्सप्रेस इन पोएट्री। मेरा ख्याल है कि मानवता की सबसे गहरी बातें साहित्य में ही कही गई हैं। मानवता का ह्रदय है साहित्य। साहित्य बेजुबानों की जुबान बनता है। मेरे पिताजी जब विदेश गए तो माँ की चिट्ठी मैं लिखा करता था। मैं चिट्ठियाँ बहुत अच्छी लिखने लगा पर मैं अपने पिता से सामने से बात नहीं  कर पाता था। साहित्य एक ऐसी जगह है जहां हम अपनी डीपेस्ट फीलिंग, डीपेस्ट थॉट लिखते हैं। साहित्य दुनिया को चेंज करने का काम करता है। एक किस्म का बागीपन उसके स्वभाव में ही होता है। आमतौर पर साहित्य वही लिखता है जिसे घुटन होती है और हम पोएट्स एक ऐसा कल्चर ढूंढ रहे हैं जहाँ हमें घुटन न हो, जहाँ हम फ्री एक्सप्रेस कर सकें। फ्रीडम मांगने वाली रूहें ही लिटरेचर लिखती हैं, ऐसा मैं समझता हूँ। ऐसे लोग ही आर्ट करते हैं। 

साहित्य की बात चली है तो फिर साहित्य की ओर अपने रुझान और अब तक के सफर के बारे में हमारे पाठकों को बताएं। 

जैसा कि मैंने बताया कि कविता का शौक तो मुझे बचपन से था पर कविताओं के कुंए से पानी तब आना शुरू हुआ जब मैं कॉलेज के दूसरे साल में था।

लिखता तो पहले भी था पर उसमें अलफ़ाज़ अहसास से जुड़ते नहीं थे। कॉलेज में पढ़ते पढ़ते मेरी पहली कविता प्रीतलड़ी में छपी। वह तब की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका थी। यह पत्रिका अब भी आ रही है पर तब वो सबसे उत्तम, सबसे मशहूर पत्रिकाओं में शामिल थी। यहाँ से दो बार मेरी कविता न छपने की चिट्ठी भी आई थी पर तीसरी बार जब छपने की खबर आई तो मेरे सारे दुःख भूल गए, उस पत्र में कुछ और कविताएं माँगी गई थी यह कहते हुए कि हम एक पूरा पेज आपको देना चाहते हैं। यह मेरे लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। एक पुरस्कार की तरह थी। वह पत्र मैंने आज तक संभाल कर रखा  है। तब लोगों ने माना कि एक कवि का जन्म हो गया है। मुझे भी तब अपने पर विश्वास हुआ। 

कॉलेज में एक साल मुझे साइंस में डाल दिया गया था। मैं स्कूल में फर्स्ट आया तो सबने कहा कि आपको तो साइंस ही पढनी चाहिए। आप कोई नालायक हैं जो आर्ट्स पढ़ेंगे। पर एक साल बाद मैं आर्ट्स में आ गया। किताबों का, कविताओं का मुझे बहुत शौक था। लाइब्रेरी से मैंने पोएट्री की सारी किताबें पढ़ीं। बेशक वे हिन्दी की हों, उर्दू पोएट्री गुरुमुखी में लिप्यन्तरित पढी। मैं कॉलेज आ कर बहुत खुश था कि मुझे इतना कुछ पढने को मिला। पटियाला आकर मुझे एक ग्रुप ऐसा मिला जो काफी पढने लिखने वाले थे। वे हमेशा विश्व साहित्य की बात करते थे। वहाँ पाब्लो नेरुदा, ब्रेख्त की बात होती थी। उन दिनों मुझे लगा कि अभी बहुत पढना शेष है। लिखना उन दिनों छूट गया। ग्रीक ट्रेजेडी, आदि मैंने पंजाबी में पढी, नए किताबों से अनुवाद के ज़रिए मुतास्सिर हुआ। वह समय मेरे निर्माण का समय था। लिख मैं तब भी रहा था पर बस अपने लिए लिख रहा था। उन दिनों हम ग़ज़ल के बहुत खिलाफ़ हुआ करते थे। हम मानते थे कि कि ग़ज़ल खंडित सा काव्य रूप है।  नज़्म में एक ऑर्गैनिक यूनिटी होती है। ग़ज़लों में ऐसा नहीं था। एक शेर ही छोटी सी पोएम है। पर इस विरोध के बावजूद मैं ग़ज़लें पढता बहुत था। एक दिन अचानक मैंने एक ग़ज़ल लिख डाली: 

कोई मेरी शाखों में से हवा बन कर गुज़र गया

और मैं दरख़्त की सांय सांय बन कर वहां खड़ा रहा

तुम्हारे कदमों पर मेरे पत्ते दूर तक गिरते रहे

मेरी बहारों का गुनाह बन कर

फिर मेरे किसी दोस्त ने मुझे शेर गुनगुनाते सुन लिया और एक दिन मुझे स्टेज पर बुला लिया। उन दिनों नक्सल आन्दोलन जोर शोर से चल रहा था जिसने साहित्य और युवाओं को झकझोर दिया कि इस निज़ाम को बदलना है, बहुत अन्याय है, बहुत गरीबी है। इन हालातों का भी मेरी पोएट्री पर असर है। उन दिनों मेरी एक पोएट्री थी:

“बूढ़ी जादूगरनी कहती है”…

इस कविता में कहना यह था कि एस्टैबलिश्मेंट लोगों को टूल की तरह यूज़ करती है। ये दौर बागी कविताओं का दौर था। मेरे मन में दो धाराएं चल रही थी, एक आपका निजी मसला और एक बागी तेवर। इनमें कोई विरोध भी नहीं था। दोनों को हम जी रहे थे। एक मुकम्मल  शख्सियत एक साथ दो अलग भूमिकाओं को जी सकता है। जो इस धरती के साथ गुजरा, वह भी मेरी पोएट्री में आता है। बाकी जो मुझसे जुड़ा है, वह भी। अभी तक ऐसे ही चलता आ रहा है। कुछ विषय हमेशा शाश्वत रहेंगे, प्रेम, ईर्ष्या ऐसे ही विषय हैं। पिछले दिनों मैंने बहुत सी कविताएं भाषा पर लिखी। बहुत सारी भाषाएँ ख़तरा महसूस कर रही हैं। 

हवा विच्चे लिखे हर्फ़, हनेरे विच सुलगदी वर्णमाला, लफ्जां दे दरगाह, पतझड़ दी पाजेब, सुरज़मीन आदि मेरे कविता संग्रह हैं। मैंने बर्टोल्ट ब्रेख्त व पाब्लो नेरुदा की कविताओं का तर्जुमा किया, गिरीश कर्नाड के नाटक नागमंडल का भी अनुवाद किया। छः अंग्रेज़ी नाटकों का तर्जुमा किया। 

भाषा के विकास के लिए आप क्या ज़रूरी मानते हैं? क्या आपको लगता है कि भाषा के विकास में सरकार की कोई भूमिका होती है या होनी चाहिए? 

भाषा के लिए बहुत जतन करना पड़ता है। एक बार मैं बाहर ऑस्ट्रेलिया गया था। वहां मुझे एक 40 साल की एक महिला मिली। उसकी 10 साल की बेटी थी। उस महिला ने मुझसे कहा कि मैंने अपनी बेटी को पंजाबी ऐसे सिखाई कि उसे कुछ भी चाहिए तो मैं पंजाबी सीखने की शर्त रखती। मुझे लगता है कि सरकारी संस्थाएं भाषा पर अच्छा काम कर सकती हैं और इसमें सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। 

अपनी भाषा में  सीखना ज़्यादा सरल और प्रभावी होता है, इस बारे में आपके क्या ख्याल हैं?

बिलकुल सही कहा आपने। जैसे मैं भी जो कुछ अंग्रेज़ी में पढता हूँ तो उसे पंजाबी में रीटेन करता हूँ। तब वह सूचना, आपकी अपनी हो जाती है।  मैं तो कहता हूँ कि साइंस भी हमारे बच्चे अंग्रेज़ी में याद करते हैं और फिर री प्रोड्यूस करते है। मुझे संदेह है कि वह उनके भीतर रहती है। मैं इस बात में यकीन करता हूँ कि टर्म तो साझी रखी जाए पर सीखना सिखाना अपनी भाषा में हो। इससे आप अनावश्यक दबाव से बचे रहेंगे। आपका ज़्यादा ज़ोर सीखने समझने में लगेगा। 

जो बच्चे अपनी भाषा में पलेंगे वे ज़्यादा मौलिक होंगे। मेरा मानना है कि शिक्षा की तरतीब ठीक होनी चाहिए। शुरुआत मातृभाषा से होनी चाहिए। सामाज में जो क्लास डिविजन है, उसमें हायर क्लास के लोगों को लगता है कि उनके कपडे भी अलग हों और ज़बान भी अलग हों, तभी वे उच्च रह सकेंगेबड़े माने जाएंगे। इसे बदलने का सबसे बड़ा तरीका यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर एक भाषा नीति होनी ही चाहिए। यह अंग्रेज़ी भाषा क्लास का भी डिफरेंस क्रिएट कर रही है। सभी भाषाएँ बचनी चाहिए, बढनी चाहिए  अन्यथा जीवन से बहुत सारी खूबसूरती गुम जाएगी। मुझे नहीं लगता कि ऐसा वक़्त आएगा कि दुनिया को ऐसी ज़रुरत आएगी कि हम सभी अंग्रेज़ी ही सीखें। भाषा एक इमोशन से जुड़ा विषय भी है। सिर्फ एक भाषा सिखाना इंसानों को मशीन बना देने वाली बात हुई। हाँ हमें रिजिडनेस नहीं रखनी चाहिए। हमें हर तरह की कट्टरता से बचना चाहिए पंजाबी में खुद कई शब्द दूसरी भाषा से लिए गए हैं। दस्तार पर्सियन शब्द है, अदालत परसियन शब्द है। हम यदि अपनी ज़बान को छोड़ दें तो बहुत कुछ मिस कर देंगे। कई बच्चे अंग्रेज़ी की वजह से मात खाते हैं और यह गलत है। 

पंजाब और पंजाबी भाषा व साहित्य को देश की सामाजिक और राजनीतिक चेतना में कहाँ पाते हैं?

पंजाबी साहित्य में कहीं कोई रीतिकाल नहीं ही। यहाँ एंटी एस्टैबलिश्मेंट की धुन आपको शुरू से ही सुनाई देगी। गुरू बादशाहों के विरुद्ध रहे। बुल्ले शाह कहते थे हाजी लोग मक्के को जाते हम जाएं तख़्त हजारे के। किस्साकार जैसे कि हीर रांझे वाले भी एंटी एस्टैबलिश्मेंट थे यहाँ। प्रेम तो अपने आप में इन्किलाब है गदरी बाबा भी ऐसे ही थे। राजनीति ने जो धर्म का हाल कर दिया कि धर्म अब प्रेरणा का स्रोत नहीं रहा। अब उसे इस्तेमाल किया जाने लगा है। राजनीति ज़रूरी है पर आज जिस तरह इसका उपयोग हो रहा है उसने इस शब्द को भी गंदा कर दिया है। खरी राजनीति और खोटी राजनीति अलग होती हैं और मेरे ख्याल से हम बहुत देर से खोटी राजनीति में फंसे हैं। यह शब्द ही बदनाम हो गया है अब। 

हमें अपना वक्त देने के लिए, हमसे इतनी सारी बातें करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया सर! आपसे बातें करना, आपको पढ़ना खुद को बेहतर करना है! आप स्वस्थ रहें, सक्रिय रहें और हम सब आपसे सीखते रहें, आपको बहुत सारी शुभकामनाएं सर!! 

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