आप भी मुक्त हों और दूसरों को भी मुक्त करें – डॉ. सरबजीत सिंह के साथ बातचीत

ऊब और निराशा से भरा दिन तब हौसले और उम्मीद से भर जाता है जब आप किसी ऐसे व्यक्ति से मिलते हैं जिनसे मिलना सीखने की बहुत सारी खिड़कियां खोल आपको साहस और संबल देता है। ऐसे व्यक्तित्व की एक खासियत यह भी होती है कि वह आपको अपने ओहदे, अपने ज्ञान से भयाक्रांत नहीं करता वरन् अपनी सहजता से आपको संवाद की ऐसी दुनिया में ले जाता है, जहां से आपको जीवन को बेहतर बनाने की एक उजली उम्मीद दिखने लगती है।

एक ऐसी ही शख्सियत का नाम है डॉ सरबजीत सिंह। सर पेशे से प्रोफेसर व अध्यक्ष है, पंजाबी विभाग, पंजाबविश्वविद्यालय चंडीगढ़ के। डॉ सरबजीत सिंह स्वभाव से शिक्षक के साथ साथ एक्टिविस्ट हैं, सामाजिक न्याय के पक्षधर हैं और बराबरी वाले एक सुंदर समाज  को गढ़ने  में योगदान दे रहे हैं। आप सबके लिए पेश हैं डॉ सरबजीत सिंह से हुई बातचीत : 

सबसे पहले तो हम और हमारे पाठक आपकी जीवन यात्रा को जानना चाहेंगे।

यह सवाल सबसे मुश्किल सवाल होता है। खासकर उन लोगों के लिए, जो किसी न किसी फील्ड में  हैं। अपने बारे में बात करना मुझे हमेशा ही बड़ा मुश्किल लगता है। मैं एक बेहद ग्रामीण पृष्ठभूमि से आता हूँ। मैं जिला लुधियाना के नारंगवाद गाँव से आता हूँ। इतिहास के पन्नों पर यह गाँव काफी महत्वपूर्ण है। ऐतिहासिक इसलिए कि प्रथम विश्व युद्ध व द्वितीय विश्वयुद्ध में इस गाँव के लोग शहीद हुए हैं और जब पंजाब में गदर मूवमेंट चली और जब शहीद करतार सिंह जैसे लोगों को फांसी लगी तब भी हमारे गाँव से 4 लोग इस आंदोलन का हिस्सा रहे जिनमें से दो लोगों ने उम्रक़ैद की सजा काटी है। इस तरह हमारे गाँव की भूमिका काफी क्रांतिकारी रही है। राजनीतिक चेतना इस गाँव के लोगों में शुरू से रही है। पंजाब का एक मुख्यमंत्री चीफ जस्टिस गुरनाम सिंह भी इस गाँव ने दिया है। 

हमारा गाँव बहुत पहले से शिक्षा के प्रति काफी सजग व सचेत रहा है। मेरे पिता और तायाजी ने 1943 में मैट्रिक की थी। हमारा दौर वह दौर था जब हम खेतों में भी काम करते थे और पढ़ाई भी किया करते थे। ज़मीन से जुड़ाव यहीं से हममें आया। हमारे समय में मैट्रिक पास को भी अच्छी नौकरी मिल जाया करती थी। मैंने वर्ष 1980 में मैट्रिक परीक्षा पास की। मेरे कई दोस्त उसी वक़्त नौकरियों में लग गए।  पर मेरे पेरेंट्स चाहते थे कि मैं अधिक से अधिक शिक्षा प्राप्त करूँ। मैं बेसिकली मेडिकल ग्राउंड से था। मेरे पिता कम्युनिस्ट थे। वे चाहते थे कि मैं रूस जाकर मेडिकल की पढ़ाई करूँ। मैं वहाँ पास भी हो गया पर मैं गया नहीं। मैं फिर आर्ट्स में आ गया। बीए के बाद मुझे स्टेट मेरिट स्कॉलरशिप मिली। पंजाब यूनिवर्सिटी में मैंने टॉप किया। मैं इस विभाग का पहला जेआरएफ हूँ। फिर मैंने चंडीगढ़ के कुछ कॉलेजों में कुछ समय पढ़ाया। एमफिल करके ही मैं पढ़ाने लगा था। पीएचडी मैंने बाद में की। मैं यूनिवर्सिटी थोड़ी देर से आया पर बतौर प्रोफेसर ही यहाँ आया। 

मैं एक बातऔरकहना चाहता हूँ किमैं सिर्फ टेबल वर्क करने वाला एकैडमेशियन नहीं हूँ, मैं साथ ही साथ एक्टिविस्ट भी हूँ। मैं अभी पीडब्ल्यूई, चंडीगढ़ का अध्यक्ष हूँ। हम अलग अलग आंदोलनों में भाग लेते रहे हैं। पंजाबी भाषा के लिए यहाँ हमने कई लड़ाइयाँ लड़ी हैं। यहाँ स्कूलों व कॉलेजों में पंजाबी अनिवार्य कराने के लिए हमने कई आंदोलन किए।

आपने बताया कि आप जिस इलाके और परिवार से आते हैं वहाँ पढ़ाई लिखाई और शिक्षा को लेकर बहुत जागरूकता और चेतना थी। शिक्षा व सामाजिक चेतना में आप क्या संबंध पाते हैं?

शिक्षाव चेतना (education and consciousness) का क्या संबंध है, यह सवाल बहुत ज़रूरी है। न्यू लिबरलाइजेशन के आने बाद हमारी नई पीढ़ी के दिमाग में करियर ओरिएंटेड होने की बात ने जड़ जमाई है। जब आप कैरियर ओरिएंटेड बनोगे तब आप प्रोफेशनल बनोगे। परिवार भी इसी ओर ज़ोर देता है। मैं यह नहीं कहता कि एजुकेशन या शिक्षा हमें जॉब या कि रोजगार न दे। पर इसके आगे मेरा मानना है कि एजुकेशन महज़ जॉब के लिए नहीं होती बल्कि इसका बड़ा और उदात्त उद्देश्य एनललाइटेनमेंट का होता है। 

आप आठ घंटे किसी दफ्तर में काम करते हो पर बचे 16 घंटे कहाँ होते हो, उन 16 घंटों में आप समाज में ही होते हो न। उस समाज के प्रति आपका क्या फर्ज़ बनता है। 19वीं सदी के बाद सोशल साइन्सेज का ग्राफ नीचे आता गया। लैंगवेज़ और लिटरेचर का ग्राफ नीचे आ गया।मैं भाषा और साहित्य में सिर्फ इसलिए आया था क्योंकि मेरा मानना है कि यहाँ पढ़ाई के साथ साथ इंसान बनने का एक प्रोसेस है 

जिस चेतना के अभाव की चिंता आप जता रही हैं, पूंजीवाद के साथ ये चीज़ें होनी ही थी। यह स्थिति पूंजीवाद का विकास है। 60 के दशक में जब डैनियल बेल एंड ऑफ आइडियोलॉजी’ की बात करते हैं तो इसका मतलब यही तो था। हम चूंकि थर्ड वर्ड के लोग थे तो यहाँ उसका असर थोड़ी देर से दिखा। वामपंथ को लेकर जो सामाजिक धारणा बनी है उसमें बहुत सारी बातों की भूमिका है। सोवियत यूनियन का फेलियर मार्क्सवाद का फेलियर नहीं था। वह एक मॉडल का फेलियर था। इस दौरान बड़े बड़े शब्द आए, ग्लोबलाइजेशन, लिबरलाइजेशन के सपने दिखाए आगे। हमारा मानना था कि इन चीजों से कंज्यूमरिज़्म बढ़ेगा और फिर  इंसान की लालसाएँ बढ़ेंगी। और फिर इससे समाज में अपराध बढ़ेंगे। मैं मानता हूँ कि पूंजीवाद अपने एजेंडे में सफल रहा है। पर ग्राउंड रिएलिटी यह है कि जब जब लोग दुखी होंगे, तब तब उठेंगे। 

वामपंथ को लेकर जो नकारात्मक धारणा है क्या उसकी वजह बहुत कंडीशंड धार्मिक आस्था है?

आपका सवाल बहुत अच्छा है। वामपंथ ने बहुत बड़ी बड़ी गलतियां की हैं और इसे हमें स्वीकार करना चाहिए। क्लासिकल मार्कस्वाद ने समाज को समझने में कोताही की है, उसके नतीजे सामने आ रहे हैं। 80 के बाद भारतीय राजनीति के संदर्भ में दलित आंदोलन को कम्यूनिस्ट ने अपने  साथ नहीं किया। वास्तव में प्रोलीटेरियट कौन हैं इसे समझना बहुत ज़रूरी है। यहाँ जाति, धर्म लिंग के आधार पर लोगों को बाहर कर दिया गया। जिनके पास कर्तव्य तो हैं पर अधिकार कोई नहीं है। इन सब बातों को समझना बहुत ज़रूरी है। ग्राम्सी जिस कल्चरल हेजिमनी की बात करते हैं, उसे समझने की ज़रूरत है। हमने इंडिया में दो बड़ी गलतियाँ की। यहाँ हमने क्ल्चरल मूवमेंट पर ध्यान नहीं दिया जो कि दिया जाना चाहिए। दूसरा यहाँ सोशल जस्टिस के मूवमेंट पर इतना ज़ोर नहीं दिया हमने उन धर्मों की बात भी नकार दी, जहां स्टेट से लड़ने की बात थी। अगर मैं पंजाब के संदर्भ में बात करूँ तो सिक्ख परंपरा क्रांतिकारी थी। 

साहित्य और कला को लेकर लोगों की जो आम धारणा है, उसमें साहित्य या कि कला के सरोकार मिसिंग हैं। आप साहित्य या कला रूप को कैसे समझते हैं और उसकी क्या ज़िम्मेदारी  मानते हैं?

मुझे लगता है कि कि किसी भी भाषा या समाज का साहित्य या कला रूप उस समाज के बौद्धिक  व मानसिक स्थिति को दर्शाता है। बड़े बड़े भवन बनाना एक बात है, बौद्धिक रूप से आगे जाना दूसरी बात है। मैं कलाओं को कमाल का एंटरटेनमेन्ट मानता हूँ। यह एंटरटेनमेंट पलछिन का नहीं होता, यह लगातार आपके साथ यात्रा करता रहता है आपने कोई पेंटिंग देखी, आपने कोई नज़्म पढ़ी, आपने कोई नाटक देखा, तो वह आपके साथ ट्रैवल करता है। सामाजिक सरोकारों की जो बात है साहित्य उसे नेताओं की तरह नहीं दिखाता। साहित्य इंसान को सेंसिबल बनाता है। 

सर, आप बता रहे थे कि आपने और आपके सथियों ने पंजाब में पंजाबी भाषा के लिए लड़ाइयाँ लड़ी। भाषा के लिए जब लड़ना पड़ता है तो उसके पीछे भी कोई राजनीति काम करती है, एक तो उस लड़ाई  के साथ और एक उसके विरुद्ध भी। आप भाषा और राजनीति के संबंध को कैसे देखते हैं?

भाषा पूरी तरह राजनीतिक मसला है। जब हम उपनिवेशवाद के समय में थे, अंग्रेज़ी भाषा में सारा काम हो रहा था। अंग्रेज़ी क्यों ज़रूरी थी तब क्योंकि शासक वर्ग उसके ज़रिए अपना एजेंडा छिपा सकता था।  भाषा का मसला इसलिए भी राजनीतिक है क्योंकि भाषा में इन्सान सिर्फ सोचता, बोलता और रहता ही नहीं है, वह अपनी सारी एक्टिविटी भाषा में ही करता है। अगर आपको अपनी भाषा में वो एक्टिविटी करने से रोक दिया जाए तो समझिए आपकी पूरी पर्सनालिटी बदल जाएगी। आप गुलाम हो जाओगे। 

दूसरी समझ एक हमारी यह भी है कि कोई भी समाज अपने भाषा और कल्चर के माध्यम से ही विकास कर सकता है इसलिए भाषा में ज्ञान, विज्ञान, शिक्षा और रोजगार होने चाहिए। यदि हमें भाषा रोजगार नहीं देगी तो हम भाषा को छोड़ देंगे। और ये रोजगार राजनीति तय करती है। कुछ  लोग ये तर्क देते हैं कि दुनिया में जो ज्ञान है वह अंग्रेज़ी भाषा में ही है जबकि यह बिलकुल बेतुकी बात है। सिर्फ 8% आबादी इस भाषा को बोल समझ सकती है। फिर ऐसे नैरेटिव स्थापित करने के पीछे की क्या राजनीति है, इसे समझने की ज़रूरत है। 

भाषा के माध्यम से उत्पादन व सोशल प्रैक्टिस  से एक बड़ी आबादी को  बाहर कर देना एक राजनीति है। इसलिए हमारी लड़ाई यह है कि ज्ञान, विज्ञान, शिक्षा और रोजगार भाषा को देना चाहिए। लोग कहते हैं कि विज्ञान की भाषा अंग्रेज़ी है जबकि यह सरासर झूठ है। हर भाषा अपने आप में समर्थ है। हर भाषा वैज्ञानिक है। इसलिए भाषा पूरी तरह राजनीतिक मसला है।   

सरकारी स्कूल और कॉनवेंट स्कूल के बच्चों की कन्डीशनिंग में ज़मीन आसमान का फर्क है। पढ़ाई में बराबर के मौके दिया जाना बहुत ज़रूरी है। रोजगार यदि आपकी भाषा में होगा तभी उसमें ज्ञान और विज्ञान भी पैदा होगा। भाषाओं को बैकवर्ड बनाया जाता है। मुझे डर है कि आनेवाले समय में भारत में एक बड़ा कल्चरल गैप पैदा होगा। एक वो लोग होंगे जो हिंदुस्तान में रहते तो होंगे पर हिंदुस्तान को समझते नहीं होंगे एक वो लोग होंगे जो मिड डे मील खा कर आए होंगे। इस गैप को कैसे दूर किया जाएगा- इसकी मुझे चिंता है आपने पाश का ज़िक्र किया, लालसिंह दिल को पढ़िएगा और देखिएगा कि दिल  हिंदुस्तान के कास्ट और क्लास को कैसे समझता और देखता है। 

कहा जाता है अपनी भाषा में सीखना अधिक सुगम और प्रभावी होता है। पर हमने अपनी भाषा में क्रिएट करना छोड़ दिया है। हम किन्ही दबावों और औपचारिकताओं में अपनी भाषा में अनुवाद कर रहे हैं। अनुवाद जिसका उपयोग आपकी भाषिक सीमा को ज्ञान की सीमा नहीं बनने देने के लिए किया जाना चाहिए, वहीं हमने अपनी भाषा को अनुवाद की भाषा बना दिया। इस स्थिति को आप कैसे देखते हैं और इसके समाधान के लिए आपकी राय क्या है?

यह स्थिति वाकई तकालीफदेह है। आप शब्दकोश के अर्थों में अनुवाद नहीं कर रहे होते, आप शब्दों के मार्फत से संस्कृति का अनुवाद करते हैं। इसे रोकने में व्यक्ति प्रयास कर सकता है पर वह प्रयास पूर्ण नहीं होगा। यह ज़िम्मेदारी स्टेट की ही है। सन 1930 में रावी तट पर नेहरू ने कहा था: हम हिंदुस्तान में भाषा उन्मुख स्टेट बनाएँगे ताकि हर भाषा हर संस्कृति को प्रेज़र्व किया जा सके| बड़ी अच्छी बात थी और ऐसा हुआ भी। यह ज़िम्मेदारी स्टेट की ही है। सिर्फ बोलने से भाषा विकसित नहीं होती। भाषा का विकास तब होगा जब वह सोशल प्रैक्टिस का हिस्सा होगी| और इसके लिए स्टेट को अपनी भूमिका निभानी होगी। यह स्थिति काफी दुखद है कि आपको अपने देश में अपनी भाषा के लिए लड़ाई लड़नी पड़े। 

पंजाब और पंजाबी भाषा व साहित्य का देश की सामाजिक और राजनीतिक चेतना में आप क्या योगदान मानते हैं? 

बहुत योगदान है! अभी आपने पाश का ज़िक्र किया था। पाश भारत में भगत सिंह के बाद एक आइकन बना है। वह कई कई भाषाओं में अनुवाद होने वाला रचनाकार है। यहाँ अमृता प्रीतम हुई, यहाँ लाल सिंह ‘दिल’ हुए। गुरदयाल सिंह जैसा लेखक यहाँ पैदा हुआ। मेरे कमरे में वहाँ गुरदयाल सिंह का स्केच है जहां नामवर सिंह का लिखा हुआ है। उनके बारे में नामवर सिंह ने कहा था: भारतीय भाषाओं में नॉवेल खत्म हो रहा था। गुरदयाल सिंह ने उसे ज़िंदा किया है। गुरदयाल सिंह पंजाबी भाषा में लिखने वाला भारतीय रचनाकार है| बाबा फरीद यहाँ हैं, गुरू नानक यहाँ हैं। यहाँ तो सूफिज़्म की समृद्ध परंपरा रही है। 

पंजाबी में छायावाद और रीतिकाल जैसा कोई समय नहीं है| पंजाब फ़्रंटियर स्टेट रहा और यहाँ के लोगों को लड़ना पड़ा है । पंजाब के लोग इसीलिए नावर किस्म के लोग हैं। पंजाबी के बहुत बड़े लेखक पूरन सिंह कहते हैं:पंजाब के जवान टैं नहीं मानते, लाठी लेकर खड़े हो जाते हैं, प्यार में गुलामी करते हैं।  डिफ़ायन्स की फीलिंग है यहाँ। 

सर, अभी आप भगत सिंह की बात कर रहे थे। आज भी लोग यहाँ तक कि राजनीतिक पार्टियां भी उन्हें क्लेम करती हैं। आपको क्या लगता है कि अगर आज भगत सिंह होते तो भी क्या उन्हें उसी तरह स्वीकार किया जा रहा होता?

मैं एक बात यह कहना चाहता हूँ स्वाती कि हर दौर के क्रांतिकारी अलग होते। भगत सिंह आज होते तो कैसे होते और उन्हें कैसे लिया जाता, इसपर सोचा जा सकता है, कल्पना की जा सकती है। हो सकता है वे अलग होते पर फिर भी वे लड़ते स्टेट के अगेन्स्ट ही। राजद्रोह और देशद्रोह में फ़र्क है। सत्ता के विरुद्ध बोलना देश के विरुद्ध बोलना कतई नहीं है क्योंकि सत्ता देश नहीं है| भारतीय संविधान हमें विरोध करने का हक़ देता है। पंजाब के लोगों का तो पाकिस्तान के साथ अज़ीज़ नाता है, हम खुद बतौर अकादमिक व्यक्ति वहाँ के अकादमिक जगत से जुड़े हुए हैं।

सर आपने बातचीत की शुरुआत में एक्टिविज़्म की बात की। मुझे हमेशा यह लगता है कि विश्वविद्यालय वह ज़मीन है जो पीढ़ियों को तैयार करती है और इस नाते जीवन को तैयार करती है। थौट प्रोसेस को तैयार करती है। आप विश्वविद्यालयों में होने वाले एक्टिविज़्म को कैसे देखते हैं और आप उन लोगों को क्या कहना चाहेंगे जो कहते हैं विश्वविद्यालयों में एक्टिविज़्म नहीं होना चाहिए।

सबसे ज्यादा सोचने वाले और दूरदर्शी लोग विश्वविद्यालयों में होते हैं चाहे वे स्टूडेंट के रूप में हों या टीचर के रूप में। जो चीज़ें जीवन को प्रभावित करती हैं उन पर बहस होनी ही चाहिए। हम क्लास में लिटरेचर तो पढ़ाते हैं पर इस बहाने से हम जीवन और उसके सरोकारों को भी पढ़ाते हैं। हम सवाल करना सिखाना चाहते हैं। पाश की एक कविता है ‘भारत‘ आप ज़रूर पढिए। 

हम लोग पढ़ते आए हैंकिइतिहास एक चीज़ है, मिथक एक चीज़ है। पर जब लोग मिथक को इतिहास मान लें तो उन्हें कैसे समझाएँ। 

देखो, समझाने के लिए मैं यह समझता हूँ कि आप लोगों के पास जाइए, उनसे बात कीजिए। जब तक हम लोगों में नहीं जाएंगे तब तक लोग नहीं समझेंगे। हमें बताना होगा कि मिथक बनाए क्यों जाते हैं। मिथक इसलिए बनाए जाते हैं कि लोग इतिहास से दूर हो जाएँ। मिथक गढ़े जाते हैं। जो लोग फ्री थिंकिंग को रोकते हैं, उन्हे ही आज़ादी के शब्द से गुरेज है| जो मिथक गढ़े गए हैं वो दूर होंगे और यथार्थ को एक दिन लोग ज़रूर समझेंगे।

सर, मैं देख रही थी आपका एक प्रोजेक्ट है:आधुनिक हिन्दी पंजाबी कविता में सामाजिक न्याय (रघुवीर सहाय और सुरजीत पातर के संदर्भ में)।सामाजिक न्याय से आपका क्या अभिप्राय है?

हाँ, हमने एक प्रोजेक्ट किया था इस विषय पर। मेरे लिए सामाजिक न्याय यह है कि सोसायटी में किसी भी डिसक्रिमिनेशन के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। आप लड़की हो, जेंडर के बेस पर आपके अधिकार कम नहीं हो जाते। यदि ऐसा होता है तो यह आपके साथ अन्याय है। कोई अनुसूचित जाति का है इस नाते उसके अधिकार कम किए जाते हैं तो यह अन्याय है, यदि कोई बच्चा है और सिर्फ इसलिए उसकी बात को अनदेखा किया जाता है तो यह अन्याय है। 

मेरा मानना है कि व्यक्ति इस पूरे कॉस्मिक का छोटा सा अंश है और उसे यहीं रहना है। सूरज कोई भेद नहीं करता धूप देने में, हवाएँ ऐसा कोई भेद नहीं करती कभी। जो भी चीज़ें प्रकृति देती है वह सबको समान रूप से देती है। जब मनुष्य उसे कैप्चर कर लेता है तभी अन्याय और भेदभाव शुरू होता है। यदि हमारे बीच, हमारे समाज में ऐसा कोई भेदभाव हो रहा है उसे खत्म करना ज़रूरी है।

आज़ादी के इतने वर्षों के बाद आपके लिए आज़ादी के क्या मायने हैं? और आपको क्या लगता है कि हम सामाजिक न्याय के कितने करीब पहुंचे हैं? 

मैं खुद को बहुत आशावादी मानता हूँ। मैं यह नहीं कहूँगा कि हमने तरक्की नहीं की। मार्क्सिस्ट होने के साथ साथ मैं रिफॉर्मिस्ट भी हूँ। 75 सालों में बहुत कुछ बदला है। यह बदलाव सुंदर है। हमारे संविधान ने यहाँ के पिछड़ों को ताकत दी है, औरतों को ताकत दी है। इसमें कोई शक नहीं कि हमने तरक्की है। पर मुझे लगता है कि नेशनल लिबरेशन मूवमेंट खत्म हुआ तो नेहरू का सोशलिज़्म डीरेल हुआ। मैं यह नहीं कहूँगा कि हम सामाजिक न्याय की तरफ बढ़े नहीं हैं, सामाजिक चेतना निश्चय ही बढ़ी है, जागरूकता  बढ़ी है पर यह सब जितना होना चाहिए था, वैसा नहीं है। दो तबकों को खासकर दलित और महिलाओं को जितना मिलना चाहिए था उतना नहीं मिला। ऐसा मैं मानता हूँ|

सर, मुझे लगता है जो रूल कर रहा है वो शोषण करेगा ही। मार्कस्वाद में कॉमन मैन की लड़ाई की बात है पर आखिर में इंटेलेक्चुअल रूल की भी बात है। यह बात मुझे खटकती है। 

मार्क्स की बेसिक थियरी सर्वहारा की बात करता है। उस विचार में रिवोल्यूशन के बाद वो आदमी तैयार करना था जिसकी सोच में ये सारी चीज़ें आए ही न। स्कूल में आपको 1- 2- 3 सिखाने के बाद लाभ हानि सिखाया जाता है। इस तरह से आपको निर्मित किया जाता है। क्रान्ति के बाद जो समाजवाद आता है वह ऐसे समय की बात है जब मनुष्य की सोच व्यक्तिवादी होने के बजाए समाजोन्मुख हो। तभी एक सुंदर समाज बन सकता है। चलिए यह भी अनुमान कर लेते हैं कि मार्क्स के सपने का जो समाज है वह हकीकत में बदतर भी हो सकता है पर वहाँ जो समानता और सामाजिक न्याय, शोषण मुक्ति  का सपना है वह सपना ही मुझे यह यकीन देता है कि समाज अच्छा बनेगा।  

सर, आप विश्वविद्यालयों की दुनिया से लंबे समय से जुड़े हैं। अभी आप बतौर प्रोफेसर जुड़े हैं, और आप एक पीढ़ी, एक समाज को बनते हुए देख रहे हैं। उससे पहले आप विद्यार्थी के रूप में जुड़े थे। इस लंबे समय में आपने बहुत सारी पीढ़ियों को बनते हुए देखा है। इस दौरान आप विश्वविद्यालयों में कैसा बदलाव देखते हैं, खास तौर पर विद्यार्थियों के संदर्भ में।

विद्यार्थियों के संदर्भ में अब मुझे कभी कभी चिंता होती है। वह चिंता इसलिए किआपने यहाँ एमए किया, यूजीसी की, आपको स्कॉलरशिप मिलने लगी, पर उसके बाद जब आप रोजगार ढूंढ रहे हैं, तब आपको मुश्किल हो रही है। पढ़ने के बाद जब विद्यार्थी सोसायटी को कॉण्ट्रीब्यूट करने के लायक बना तो हम उसे कुछ नहीं दे पा रहे। 

दूसरा, मुझे एक तकलीफ यह है कि पिछले कुछ सालों से, आप दशक भी कह सकते हैं, पंजाब के लोग दसवीं 12वीं कर माइग्रेट हो रहे हैं। उनके साथ पंजाब का बहुत पैसा बाहर जा रहा है। पैसा तो इंसान फिर भी कमा लेगा, पर जो टैलेंट जा रहा है, वह हमारा नुकसान है। पंजाब को ग्रीन रेवोल्यूशन के मॉडल ने तो बंजर किया ही, पंजाब बौद्धिक तौर पर भी बंजर न हो जाए, यह चिंता मुझे होती है बहुत। 

पास पढ़ते स्टूडेंट जब बोलते हैं कि वे बाहर जा रहे हैं क्योंकि यहाँ रोजगार नहीं है तो चिंता होती है। रोजगार की उनकी चिंता वाजिब है। आने वाले पंजाब का क्या होगा, यह एक बड़ी चिंता है। दूसरी बात यह भी है  कि क्या सारा पंजाब बाहर चला जाएगा, नहीं जाएगा। जिनके परिवार पैसे खर्च कर सकते हैं वही जाएंगे, इन्हीं दिक्कतों के बीच नशा बढ़ता है, अपराध बढ़ते हैं। ये सब बातें मुझे चिंतित करती हैं|

आप एक शिक्षक के तौर पर, एक एक्टिविस्ट के तौर पर, एक नागरिक के तौर पर हम जैसों को, अपने सुनने वालों को, अपने पढ़ने वालों को क्या कहना चाहेंगे? 

आप अपने साथ के लोगों के साथ कैसेबर्ताव करना चाहते हैं, आपका सपना क्या हो सकता है। आदमी जब धरती पर आता है तो वह नहीं जानता कि वह किस जाति में है, किस धर्म मेंहै, किस रंग में है। ये सारी चीज़ें आदमी की गढ़ी हुई है। ज़रूरी नहीं कि हर आदमी एक्टिविस्ट हो, पर सबको यह ज़रूर सोचना चाहिए कि जहां भी, घर या बाहर, उसे गलत लग रहा है तो लड़ना चाहिए। ज़रूरी नहीं कि आप झण्डा लेकर सड़कों पर आएं पर अपने दायरे में गलत के खिलाफ लड़ाई ज़रूर लड़नी चाहिए।आप भी मुक्त हों, और दूसरों को  भी मुक्त करें। समाज  के विकास के लिए यही सबसे ज़रूरी है| और इस समाज को आप जितना कंट्रीब्यूट कर सकते हैं उतना करें क्योंकि इस सोसायटी ने आपको बहुत कुछ दिया है। 

संवाद जहां होगा, वहाँ स्पेस होगी। इस स्पेस को बनाए बचाए रखना हमारी ज़रूरत भी है और हमारी ड्यूटी भी क्योंकि यही हमारे ज़िंदा रहने की निशानी है।

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